शनिवार, 13 जुलाई 2013

इतनी सारी हत्याएं

मिथिलेश श्रीवास्तव

पाब्लो नेरुदा की हत्या हुई थी । उनके मरने के चार दसक अर्थात चालीस बरसों के बाद जांच शुरू हो चुकी है ।। तब कहा गया था कि उनकी मृत्यु कैंसर से हुई थी । चिली के तब के तानाशाह अगस्तो पिनोचेट के आदेश पर यह हत्या हुई थी, ऐसा संदेह है । चिली जहाँ के नेरुदा थे, के बारे में कहा जता है कि वहाँ के लोग अपने आदर्श पुरुषों का आदर नहीं करते और उनकी टांग खिचाई करते हैं । भारत के लोगों खास कर के हिंदी वालों का स्वाभाव चिलीवासियों से हु-ब -हु मिलता  है ।  वे भी अपने आदर्श पुरुषों मसलन लेखकों, कविओं, कलाकारों के साथ चिलीवासिओं की तरह ही पेश आते हैं । एक अच्छा लिखता है तो दूसरा जल उठता है । एक को पुरस्कार मिलता है तो दूसरा सीने पर हाथ रखकर आल इज वेल कहने लगता है । पाब्लो नेरुदा की हत्या की जांच तो हो रही है , चालीस बरसों बाद ही सही । यहाँ रोज़ हत्याएं होती हैं , हत्या की कोशिश होती है और मज़ाल की कोई चू तक करे । 

मिसाल के तौर पर अज्ञेय  की हत्या करने की कोशिश बरसों से की जा रही है । उनके विपुल साहित्य को एक सिरे से खारिज़ करने की कवायद की तुलना आतंकवादी हमले से की जा सकती है । लेकिन अज्ञेय के लेखन की शक्ति है कि हमलों के बीच से वे फिर खड़े हो उठते हैं, बैसाखी के बगैर । हत्या की इस कोशिश के विरुद्ध कुछ कारगर आवाजें  हमेंसा उठती हैं लेकिन इसकी कोई जांच नहीं होती । रघुवीर सहाय की हत्या की कोशिश और पुरजोर ढंग से होती है । पहले पूछा जता है रघुवीर सहाय मार्क्सवादी हैं । हत्या की कोशिश के पहले रघुवीर सहाय को पढो तो सही । रघुवीर सहाय कहा करते थे कि वे आवाक हैं कि रघुवीर सहाय काम तो मार्क्सवादियों वाले करते हैं, लेकिन अपने आप को मार्क्सवादी नहीं कहते । अब रघुवीर सहाय से बढ़ कर जन कवि कौन हो सकता है जो मर तमाम लोगों को आगाह करते रहे कि हत्या होगी । जिस दिन दिनमान के संपादन से उन्हें विमुक्त कर दिया गया था उस दिन हमने कहाँ पूछा था कि एक नया मनुष्य बनाने के अभियान पर निकले एक कवि को  दिनमान से क्यों विमुक्त कर दिया गया । यह वही समय था जनता पार्टी की सरकार बिखर गयी थी, जय प्रकाश नारायण के संचालन में चले आन्दोलन अपने पराभव पर था और इंदिरा गाँधी की वापसी हो चुकी थी । समाज ने मान लिया कि वैचारिक विमर्श का समय ख़त्म हो गया और दिनमान को अस्त हो जाने दिया । दिनमान के पतन, दिनमान से रघुवीर सहाय का निष्कासन भी हमारे लिए आन्दोलन की वजह होना चाहिय था जो कि नहीं हुआ । क्या हमारी आखों के सामने हत्या होने के सदृश्य नहीं है यह ? अज्ञेय भी खूब पढ़े जा रहे हैं और रघुवीर सहाय भी । रघुवीर रचनावली अब उपलब्ध नहीं है, ऐसा बताते है। निर्मल वर्मा की भी हत्या की कोशिश हुई है जब उन्हें संघी कहा गया । 
रविन्द्र नाथ ठाकुर की हत्या की नई  कोशिश शुरू हो चुकी है । शुरुआत कन्नड़ लेखक गिरीश कर्नाड ने यह कह के किया कि ठाकुर के नाटक दोयम दरजे के हैं । अब  विष्णु खरे ने कहा है कि रविन्द्र नाथ ठाकुर को पढ़ता कोई नहीं है और उनका लेखन अंग्रेजी अनुवाद में दोयम दर्जे का लगता है । यह तो हद हो गई । विष्णु खरे से पूछा जाना चाहिए कि आखिरकार कौन से लेखक सच्चे मायने में पढ़े जाते हैं या पढ़े जा रहे हैं । किसी किताब की पांच सौ प्रतियां सरकारी खरीद के जरिय बेंच कर प्रकाशक हो रहे है मालामाल और लेखक वैसे के वैसे । विष्णु खरे, अशोक वाजपेयी, लीलाधर   जगूड़ी के मन में कहीं न कहीं यह कशक होगी ही  कि उनके लिए भी सुपारी दी गयी है तभी तो उनके साहित्यिक अवदान को तवव्जो जो मिलनी चाहिय मिल नहीं रही है। उदय प्रकाश तो घायल मन पड़े ही है। शिल्पायन सानिध्य में शामिल कविओं को तो भुन डालने की ही कोशिश की गयी थी । 

वार दोनों तरफ से हो रहे हैं । शीतयुद्ध के बाद वार का रूप आक्रामक हो गया है । सहनशीलता, सहिष्णुता, विराटता, उदारता तिरोहित हो रहे हैं । ऐसा क्यों हो रहा है शायद इसलिय कि दुनिया एकध्रुवीय हो गयी  है और साहित्य इस एकध्रुवीयता  के संकट को तो देख रहा है लेकिन इसकी ऐतिहासिक अनिवार्यता को स्वीकार करने से बच रहा है।    एकध्रुवीयता ने हमें स्वदेशी की परिभाषा को जानने समझने का एक अच्छा मौक़ा दिया है जिसको हम अपनी निरंतरता से जोड़  कर देख सकते हैं । रविन्द्र नाथ टैगोर ने इंसानियत की इसी निरंतरता के सौंदर्य को देखा और संगीतमय कविता में अभिव्यक्त किया जिसे सारे संसार में माना गया । वे ठाकुर थे, राजघराने से थे, रसूखदार लोगों का अंग्रेजी हुकुमत के साथ दोस्ती भी निभती थी  । वे इतने संपन्न थे कि वे अपनी रचना रसूखदारों के बीच ले कर जा सकते थे । 

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

कुछ जज्बात मेरे भी-3

1.
मैं उससे बातें करती हूँ जब वो मेरे पास होती है
मेरे उद्वेलित होने पर पास आकर धीरे से
थाम लेती है मुझे
नहीं किरोलती मेरे दुःख को
नहीं करती खिलवाड़ मेरी भावनाओं से
मेरे दुःख पर हाथ फेरती है
दुखती रग पर नहीं
उस सागर से निकलती है
जिसमे मैं डूबना नहीं चाहती
मुझे हर डर से बचाती है
नहीं चाहिए मुझे वो भीड़
जो मुझे अकेला कर देता है
मैं खुश हूँ
अपनी तन्हाई से साया जो है वो मेरा
नहीं चाहिए वो भीड़
जहाँ मैं हो जाती हूँ अकेली
हाँ मेरी तन्हाई ही अब मेरा साया है
और मैं उससे ही बातें करती हूँ हमेशा

2.
जहाँ विश्वास हो वहां चमत्कार होता है
जहाँ चमत्कार होने लगे वहां से विश्वास पलायित होने लगता है
चमत्कार आँखों से दीखता है विश्वास दिल से
हम कहते हैं दिल की सुनो

3.
अनजाने में ही मैंने उससे पूछा
तुम्हे कहाँ जाना है भाई
उसने कहा , जहाँ की कोई खबर नहीं
मैंने फिर पूछा , तुम जानते हो किसी को वहां
उसने कहा , हाँ , जानता हूँ न
उन काले पत्थरों को जानता हूँ
उनमें सुलगती आग को जानता हूँ
उस आग में झुलसे बचपन को जानता हूँ
उनसे जले युवाओं के सब्र को जानता हूँ
जानता हूँ न ,क्यों नहीं जानता
उनकी उम्मीदों को जानता हूँ
उनके प्रतिरोध को जानता हूँ
क्या आप मुझे जानते हो
उसने मुझसे पूछा
और मै निरुत्तर हो गई           - अनीता  

 

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

कुछ जज्बात मेरे भी-2

1.
प्रासंगिक तो कुछ भी न था
फिर भी एक प्रसंग सा बन गया
नाउम्मीद तो कुछ भी न था
पर कहीं एक उम्मीद सी जगी
अन्याय के समंदर में
न्याय की एक शिला जरुर थी
वह शिला अहिल्या नहीं थी
जो राम के पावन स्पर्श के इंतजार में
जमी रही समंदर लहरों में भी
हाँ शायद वो डूबने से बचने का जरिया थी
आज वह शिला कितनी अहिल्याओं को देगा सहारा
और क्या बचा पायेगा लहरों से ?
क्यों ?
जी ,क्योंकि शिला ,अहिल्या नहीं ,
पर अहिल्या शिला जरुर बना दी जाती हैं
2.
उठो पार्थ गांडीव संभालो
ऐसा ही कहा था कृष्ण तुमने अर्जुन से महाभारत में
कहाँ हो कृष्ण ?
आज महाभारत है
ध्रितराष्ट्र भी हैं जो संजय की आँखों से देखते है
हाँ कोरवों की सेना पूरी है संख्या में
पांडव भी अपनी गिनती के हैं जो धर्मराज से वचनबद्ध हैं
अश्वथामा, द्रोण गुरु ,मजबूर है
कृष्ण नहीं हैं आज
पर भीष्म पितामह आज भी हैं पर
प्रतिज्ञाबद्ध ।
3.
रिश्तों की कसमसाहट को मैंने भी महसूस किया है
कभी वो रिश्ता हमें अपने साये में महफूज़ रखता है
कभी हमें निर्वस्त्र कर देता है
हाँ रिश्ते आजकल वस्त्र की तरह होते जा रहे हैं
पर मैले होने पर बेदाग नहीं हो सकते वस्त्र की तरह
जब हमें उसकी कसमसाहट से घुटन होने लगती है
हम उसका दायरा बढ़ाने के बजाय बदल देते हैं वस्त्र की तरह
और डाल लेते हैं अपने ऊपर मज़बूरी का एक मोटा जामा
खुद को बचाए रखने के लिए
क्योंकि रिश्तों की गर्माहट कम होने लगी है
4.
आकृतियाँ बनती हैं बिगड़ने के लिए
आकृति को बिगड़ने से बचाना है
अपनी मनचाही आकृति हम खुद बनाते हैं
और उसमे अनचाहा रंग भर देते हैं
एक आकृति मैंने भी बनाई थी
उसमे सारे रंग भर दिए थे
तभी वह सफ़ेद हो गया
कहते हैं सारे रंगों का मेल
एक ऐसा रंग देता है
जो बेरंग होता है
अब आकृतियाँ तो बनती हैं
पर उसमे रंग भरने से डरती हूँ
5.
निस्तब्ध थी वो रात
बेचारगी से भरी थी दुनिया
मन का खुद से हो रहा था प्रतिरोध
और भस्म हो रहा था विश्वास
कहीं किसी ओर नहीं था कोई प्रतिकार
सन्नाटे चीर कर आई एक चीत्कार
और हो गयी फिर कोई और एक ममी में तब्दील     -अनीता 

कुछ जज्बात मेरे भी-1

1
जज्बात दिल में न हों
तब उसकी यादें ,न तो मीठी होती है न कड़वी
फिर उसकी दिल में क्या जगह
पर उसे दिल से निकाल कर
दिमाग के किसी कोने में बंद कर देना चाहिए
ताकि दिल को कोई तकलीफ न हो ,
पर दिमाग में वह एक सोच की तरह हो
वह सोच जो हमें कुछ ताकीद करें
2
लगता है एक पल कोई रिश्ता बनाने में
मुश्किलें आती हैं मगर दूर तलक उसे ले जाने में
वादा करते तो हैं ता:उम्र उसे निभाने का
टूट जाते हैं मगर रिश्ते जाने अनजाने में
आता क्यूँ है कोई अपना बन कर दिल के करीब
जब होती है मुश्किल एक गलती भी भुलाने में
खैर अच्छा किया तोड़ दिया भ्रम मेरा
सोचती थी की हूँ अच्छी रिश्ते निभाने में
टूटे रिश्ते तो चुभते तो होंगे उन्हें
मेरा दिल अकेला ही तो ऐसा नहीं ज़माने में

किसी रोज एक क्षण गुजर जाता
शायद आता
पर आता तो सही
छोड़ जाता कुछ मधुर यादें
पर ,आता तो सही

दो जानने वाले अजनबी
अनजान रहे
पाता ही न चला
साथ रहकर भी अकेले रहे
सानिध्य की तलाश में
इक दूजे को दूंदते हुए
खो गए एक दूजे में नहीं

वक्त के कुछ पलों की गुजारिश है
मुश्किलों के साथ चलने की हमें ख्वाहिश है
जिंदगी हम कुछ इस तरह से जीते हैं कि
हर पल हौसलों की अजमाइश
चलकर गिरना ,गिरकर संभल जाना है
क्या फिर से गिरने की गुंजाइश है
हाँ जीवन की यह भी एक नुमाइश है       -अनीता 

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

नारे आवाजें और मोमबत्तियां-मिथिलेश श्रीवास्तव

29 दिसम्बर ,2012 शनिवार था और वह दिन अकादमी आफ फ़ाईन आर्ट्स एंड लिटीरेचर के बहुप्रशंसित मासिक साहित्यिक कार्यक्रम डायलाग का था।रघुवीर सहाय की स्मृति को समर्पित इस स कार्यक्रम में आज के समय में उनकी प्रासंगिकता पर परिचर्चा होनी थी और उनकी कविताओं का वाचन होना था। तबतक देश दामिनी के साथ हुए दर्दनाक हादसे के शोक में डूब चुका था। हम सब उस हादसे को ऐसे महसूस कर रहे थे जैसे दामिनी हमारी बेटी है और वह हादसा हमारे घर में ही घटित हुआ है । न भूख लग रही थी, न नींद आ रही थी, न दिल में नए साल के आगमन का हुलास था। टेलीविजन खोलकर दामिनी के ठीक होने की खबरें जानने के लिए बैठे रहते। उस दिन सुबह से सैकड़ों फोन आ चुके कि क्या डायलाग में रघुवीर सहाय की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम होगा। त्रिनेत्र जोशी का पहला फोन आया। लगभग सिसकते हुए त्रिनेत्र जोशी ने पूछा कि क्या यह कार्यक्रम होना चाहिए। मंगलेश डबराल का फ़ोन आया, क्या आज कार्यक्रम होगा। संजय कुंदन, प्रियदर्शन, उपेन्द्र कुमार, लीलाधर मंडलोई और कई अनेक साहित्यकार मित्रों ने फोने करके यही प्रश्न पूछा। उनके सवाल करने के पीछे भावना यही थी कि जब देश शोक में डूबा हो और दामिनी के ठीक होने के लिए प्रार्थना कर रहा हो ऐसे में इस कार्यक्रम को स्थगित कर देना चाहिय । सब लोग शोक संतप्त से थे। मैंने सबसे कहा कि कार्यक्रम होगा। आप सब आयें। रघुवीर सहाय और उनकी कविता व्यवस्था विरोध का ही दूसरा नाम है। हम उनकी कविताएँ पढ़कर और उनको यादकर अपना आज विरोध प्रकट करेंगे। क्रूर और नृशंस होते जा रहे समाज, सरकार, व्यवस्था, पुलिस, राजनीति और उस आदमी के जो हम बना रहे हैं के प्रति हम अपना विरोध और रोष प्रकट करें। मेरे ऐसा कहने पर कार्यक्रम होने देने के लिए सब तैयार हुए और आखिर में वह कार्यक्रम एक शोक सभा और विरोध प्रदर्शन में बदल गया। कई पीढ़ियों के लगभग सत्तर कवि लेखक थे जिन्होंने अपना रोष प्रकट किया । रघुवीर सहाय की एक कविता पढ़ी जाती और विरोध का प्रदर्शन होता । कविता पढ़ने के पहले हहर कवि-वाचक अपने वक्तव्य में उस घटना की निंदा करता और पुलिस और व्यवस्था के विरोध में बोलता। लेकिन यह व्यवस्था विरोध यहीं नहीं हुआ बल्कि देश का हर घर व्यवस्था विरोध की जगह में बदल चुका था। हर परिवार अपने बैठक में टेलीविजन के चौबीस घंटे वाला समाचार चैनल खोलकर बैठा रहा और पल पल की अपनी प्रतिक्रिया से सरकार और व्यवस्था का विरोध कर रहा था। उनकी दुआओं में दामिनी थी उनकी शुभकामनाएं दामिनी के लिए थीं। वे चाहते थे कि सरकार दामिनी के इलाज और उसे बचाने में कोई कोताही नहीं बरते। डाक्टर कोई ढिलाई नहीं बरतें। साधनों की कमी न हो। दामिनी तो बचायी नहीं जा सकी लेकिन अब लोग आज भी इस बात के लिए प्रार्थनारत हैं कि उसे न्याय मिले, अपराधियों को जल्द से जल्द कड़ी से कड़ी सजा मिले। व्यवस्था, पुलिस, सरकार चेते और अपने दायित्व का सही निर्वाह करे। हम जो आदमी बना रहे हैं उसे और अच्छे से बनायें। 

दरअसल कार्यक्रम का होना या न होना यहाँ महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह जान लेना शुकून देनेवाला था कि समाज का हर तबका इस दुख में अपने आपको शामिल पा रहा था और परिवर्तन की आकांक्षा से भर गया था। लेखक भी इसी समाज में रहता है और एक साधारण सामाजिक प्राणी की तरह उस दुःख में शामिल था और हर उत्सव का प्रतिकार और वहिष्कार कर रहा था और कर देना चाहता था। यह पहली बार हुआ कि इस घटे को सारे देश ने अपने घर में घटा हुआ महसूस किया। कई परिवारों में तो टेलीविजन इसलिय देखा जा रहा था ताकि पल पल की खबर मिलती रहे। 

राजपथ पर युवाओं जिनमें संतानवे प्रतिशत छात्र थे, को देखकर 1975 का बिहार का छात्र आन्दोलन याद आ रहा था । वह एक आन्दोलन था जिसे छात्रों ने अंजाम दिया था। आज के आन्दोलन में भी हमारे बच्चे हिस्सा ले रहे थे। हमारे युवाओं के प्रति जो यह धारणा बनने लगी थी कि वे बाजार परस्त हो गए हैं, मौजमस्ती में ही रहने वाले हो गए हैं, परिवार, समाज और राजनीति से विमुख होते जा रहे हैं अचानक इस आदोलन की वजह से टूट गई। हमारे बच्चों में विरोध करने की आकांक्षा भी है, ताकत भी है। दुःख को महसूस करने की संवेदना भी है। पानी की बौछारें वे सह सकते हैं, लाठियों की मार से उनकी हड्डियाँ टूटती नहीं। सरकार और पुलिस उनके हौसले तोड़ नहीं सकते। वे अपनी आखों से अपने देश, समाज, परिवार और लोगों को देख रहे हैं। हमारे बच्चों ने हमें यतीम हो जाने के लिए छोड़ नहीं दिया है। यह आन्दोलन एक बच्ची के साथ हुए हादसे के लिए संघर्ष कर रहा था । अगर यह आन्दोलन जोर नहीं पकड़ता तो अस्पताल से लेकर पुलिस प्रसाशन तक उस बच्चे के साथ लापरवाही भरे बर्ताव करता। इतना ही नहीं यह आदोलन सारे प्रशासनों की जड़ और संवेदनाविहीन प्रवृतियों के विरुद्ध भी एक जायज और सार्थक आवाज थी । हम सब इस आन्दोलन में शरीक हैं। हमारे बच्चों के नारे, उनकी मोमबत्तियों से निकली हुई रोशनियाँ, उनके विरोध की आवाजें ही हमें बचाए रखेगीं।

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

धूप में सीढ़ियों पर- मिथिलेश श्रीवास्तव

पांच बरस बहुत बरस होते हैं । हिंदी के सुप्रसिद्ध बहुचर्चित सर्वस्वीकृत कवि रघुवीर सहाय की एक कविता की पंक्ति है और वह भारतीय राजनीति की तस्वीर दिखाने वाले आईने सरीखी है । यह कविता आपातकाल के बाद के किसी समय में कभी लिखी गयी होगी। रघुवीर सहाय अपने समय के आगे के समय की राजनीति और समाज को साफ़ साफ़ देखने वाले कवि हैं। पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में भारतीय राजनीति का एक ऐसा दौर शुरू होता है जहां राजनितिक दलों में पांच बरस और पांच बरस फिर और पांच बरस के लिए सत्ता में बने रहने की होड़ सी लग गयी और सत्ता में बने रहने के दौरान कुछ नहीं करने की प्रवृति भी उनमे में आ गयी। पांच बरस के बाद पांच बरस और जनता से मांगने की कुप्रवृति राजनितिक रणनीति के रूप में देखने में आई। इसका आभास रघुवीर सहाय की कविता में मिलता है। रघुवीर सहाय आज होते तो जरूर कहते अब किसी दल को पांच बरस नहीं मिलने चाहिय ।

रघवीर सहाय सर्वस्वीकृत कवि इसलिय थे कि उनकी स्वीकृति वामपंथियों में उतनी ही थी जितनी दूसरे पंथियों के बीच थी। अपने बाद की पीढ़ी लेकिन समकालीन कवियों के बीच वे काफी लोकप्रिय रहे जबकि उनमें से अधिकांश वामपंथी थे और उन पर उनका प्रभाव भी गहरा था । वर्तमान राजनीतिक हालात और मार तमाम लोगों की दुर्दशा के समय में रघुवीर सहाय अत्यंत प्रासंगिक हैं। उनकी नजर क्रूर होती सत्ता के चरित्र, लोकतंत्र का माखौल बनाते राजनीतिज्ञों, समाज में बिचौलियों के बढ़ते दब-दबे को देख रही थीं। दिक्कत यह है कि यह समाज अपने साहित्य से रचनात्मक संबंध बनाने के लिए उद्धत होता दिखाई नहीं देता। आदमी के बनने की प्रक्रिया को बदल देने की आकांक्षा उनकी कविता में में देख सकते हैं। दुःख को रोज सहने की विवसता उनकी कविता हमें दिखाती है।

9 दिसम्बर, 1929 के रोज उनका लखनऊ में उनका जन्म हुआ था और 30 दिसम्बर, 1960 की शाम दिल्ली के प्रेस एन्क्लेव वाले उनके फ्लैट में उनका देहांत हुआ। उस दिन वे साठ साल इक्कीस दिन के थे दीर्घआयुता के इस जमाने में साठ साल में मरना अल्पायु में ही मरना कहेंगे। सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध , हँसो हँसो जल्दी हंसो, लोग भूल गए हैं और कुछ पते कुछ चिठियाँ उनके पांच कविता संग्रह हैं जिनके बारे में वे खुद कहा करते थे कि वे पांच छलांगे हैं। अपनी कविता के महत्त्व को वे समझते जानते थे। पत्रकारिता का प्रमाणिक और विश्वसनीय रूप हमारे सामने रखा, भाषा और खबरों दोनों की विश्वसनीयता। उन दिनों उनके संपादन में निकल रहा दिनमान हमारे लिए बौधिक प्रतिष्ठा का प्रतिक था। जो युवा या छात्र दिनमान नहीं पढ़ता उसे बौधिक रूप से पिछड़ा मान लिया जाता । अंग्रेजी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं से होड़ ले रहा था दिनमान। दिनमान का संपादन रघुबीर सहाय ने लगभग तेरह वर्षों तक लगातार किया । 

रघुवीर सहाय भीतर से लोकतांत्रिक आलोक से आलोकित थे। इस देश में समता और समाजवाद स्थापित हो, हर तबके के लोग खुशहाल हों, लोग लोकतंत्र को महसूस करें, समाज परिवार राजनीति से पाखंड दूर हो यही उनका लोक दर्शन था। वे पूंजीवादी नहीं थे, मार्क्सवादी भी नहीं थे। उनकी विचारधारा को लेकर लोगों में भ्रम रहता है। वे कहते थे, " लोग कहते हैं कि मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ लेकिन यह भी कहते हैं कि मेरा काम मार्क्सवादियों ज़रा सा भी कम नहीं है।" पुरातनपंथी परिभाषा के तहत कहा जाता है कि मार्क्सवादी वही है जो संगठन के लिए काम करत्ता है । यह परिभाषा अब जड़ हो चुकी है। जो उपेक्षित दबे कुचले हाशिय पर धकेल दिए गए समाज के अंतिम आदमी की आवाज को पहचानता और शब्द देता है वही मार्क्सवादी है।आने वाले संकट को पहचान लेने की अदभूत क्षमता थी। ' हँसों हँसों जल्दी हंसों' संग्रह की कविताओं के बारे में यह भ्रम होने लगत्ता है कि वे आपातकाल के दौरान लिखी गई होगीं। इस संग्रह में 1967 से लेकर 1974 के बीच लिखी गई कविताएँ हैं। आपातकाल का भान कवि को हो चुका था। यह वही समय है जब आदमी को यह सबूत देना पड़ता कि वह शर्म में शामिल है। ' ऐसे हंसों कि बहुत खुश न मालूम हो/ वरना शक होगा कि यह शख्स शर्म में शामिल नहीं /और मारे जाओगे ।' रघवीर सहाय लिखते हैं कि आपातकाल के दौरान उन्होंने कोई कविता नहीं लिखी।

रघुवीर सहाय कि कविता के बारे में एक विवाद यह भी है कि ' इसमें काव्य नहीं अखबारी कतरनें हैं।' रघुवीर सहाय ने खुद यह कहकर इसका प्रतिवाद किया कि अखबार में लिखना या खबरनवीसी करना अपनी भाषा उतना ही रचनात्मक है जितना कविता करना । अज्ञेय ने रघवीर सहाय के बारे में लिखा है कि वे चट्टानों पर नाटकीय मुद्रा में बैठने का मोह छोड़ साधारण घरों की सीढियों पर धुप में बैठकर प्रसन्न हैं।